में लंड की दीवानी


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प्रेषक : मधु …

हैल्लो दोस्तों, मेरा नाम मधु है, मेरी शादी को 3 साल हो गये है, मेरा रंग गोरा, चेहरा आकर्षक और बदन कसा हुआ है। मेरे पति मुझे बेहद प्यार करते है, लेकिन ना जाने क्यों में अभी तक माँ नहीं बन पाई हूँ? हालाँकि मेरे पति का बदन तगड़ा है, उनके लंड का आकार भी ठीकठाक है, लेकिन मुझे उनके साथ चुदाई करने में मज़ा नहीं आता है, इसका कारण में स्वयं भी नहीं जानती हूँ। वैसे अंधरूनी तौर पर पिछले कई सालों से में एक मनोविकृति का शिकार हूँ। मुझे अपनी उम्र के मर्दों के बजाए कम उम्र के लड़कों के साथ संभोग की कल्पना करके ज़्यादा रोमांच महसूस होता है और में अपने पति की नज़र बचाकर कई बार अपनी ये इच्छा पूरी भी कर चुकी हूँ।

एक बार में अपने घर में अकेली थी, तभी पड़ोस का एक लड़का मेरे घर पर आ गया, उसका नाम दीपू था। अब दीपू को एकांत में पाकर मेरी भावनाएँ भड़क उठी थी। अब पहले तो में उसे लेकर काफ़ी देर तक बिस्तर पर लेटी रही और फिर मैंने अपनी कुर्ती उतार डाली और मेरी ब्रा में से एक चूची बाहर निकालकर दीपू को पिलाने लगी। अब स्तनपान कराते-कराते मेरी उत्तेजना इतनी बढ़ गई थी कि मैंने अपनी सलवार भी हटा दी और फिर अपनी चूत दीपू के होठों से लगा दी। अब दीपू मेरी चूत को चूमने, चाटने लगा था, तो मेरी उत्तेजना और बढ़ गई और मैंने दीपू की पेंट नीचे सरकाकर उसका लंड बाहर निकाल लिया। फिर कुछ देर तक उसका नर्म लंड मसलने के बाद मुझसे रहा नहीं गया, तो मैंने उसके लंड को चूसना शुरू कर दिया। लेकिन मेरे चूसने के बावजूद दीपू के लंड में उतना कड़कपन नहीं आ पाया था कि वो मुझे संभोग का मज़ा दे पाता।

अब में हारकर उसके लंड को ऊपर से ही अपनी चूत पर रगड़ने लगी थी। फिर काफ़ी देर के घर्षण के बाद आख़िरकार मेरा झड़ना शुरू हो गया। इस पुरानी घटना का जिक्र करने के पीछे मेरा मकसद सिर्फ़ यह बताना है कि में शादी से पहले ही कम उम्र के लड़कों की दीवानी थी और शादी के बाद तो मेरा ये शौक और बढ़ गया था। फिर जब मेरी शादी होकर में ससुराल आई, तो यहाँ मेरे पति के अलावा उनका 18 साल का भाई रवींद्र भी रहता था, वो हाई स्कूल में पढ़ता था। उस समय मेरी उम्र 24 साल थी, हालाँकि उम्र के लिहाज से मेरे 28 वर्षीय पति मेरे जोड़ के थे, लेकिन मेरी निगाहा पहले ही दिन से उनकी बजाए उनके छोटे भाई पर थी।

फिर कुछ दिनों के अंदर ही मुझे रवींद्र के साथ खेलने का मौका मिल गया। अब मेरे पति 2 दिन के लिए बाहर गये हुए थे अब घर में, में और रवींद्र अकले थे। फिर मैंने रात के वक़्त डर लगने का बहाना करके उसे अपने बिस्तर पर ही सुला लिया। अब मैंने सोते वक़्त जानबूझ कर नाइटी पहनी थी और मेरे दोनों आंतरिक कपड़े यानी ब्रा और पेंटी उतार दी थी। फिर लाईट बुझने के बाद रवींद्र जैसे ही मेरे पास आया। तो में अपने कपड़ों में कोई ज़हरीला कीड़ा घुस जाने का शोर करती हुई चीखने लगी, यह सिर्फ़ मेरा नाटक था ताकि मेरा देवर लाईट जलाकर मेरे कपड़े हटाने को मजबूर हो जाए और हुआ भी ऐसा ही। फिर जैसे ही मैंने झूठमूठ तड़पने का बहाना करते हुए चीखना शुरू किया, तो रवींद्र ने घबराकर जल्दी से लाईट जला दी और मेरे कपड़ों को उलट पलट कर कीड़ा ढूँढने लगा, वो कीड़ा तो खैर तब मिलता ना, जब वो होता। लेकिन हाँ इस उथल पुथल में मेरी नाइटी ज़रूर मेरे बदन से कुछ इस तरह सरक गई थी कि उसका होना ना होना एक समान हो गया था।

अब ना सिर्फ़ मेरे दोनों स्तन बल्कि मेरी दोनों जांघे, कूल्हें और चूत भी पूरी तरह से खुल गई थी। अब मेरी नाइटी एक महीन दुपट्टे की शक्ल में मेरे पेट तथा नाभि तक सिमट कर रह गई थी। अब रवींद्र अपनी मुग्ध निगाहों से मुझे घूरने लगा था, यही तो में चाहती थी। लेकिन फिर भी मैंने अपनी चूत को अपने हाथों से छुपा लिया और शर्माने की एक्टिंग करते हुए बोली कि क्या देख रहे हो रवींद्र? तो रवींद्र बोला कि भाभी तुम कितनी सुंदर हो? तो में बोली कि हे राम मुझे लज्जा आ रही है और अपनी जांघे मोड़ ली और उससे बोली कि कम से कम लाईट तो बंद कर दो। अब इतना सुनते ही रवींद्र फुर्ती से बिस्तर से उठा और उसने तुरंत लाईट बंद कर दी। फिर उसके बाद जैसे ही वो मेरे पास आया, तो मैंने उसे दबोच लिया। अब कमरे में अंधेरा था इसलिए मुझे शरमाने का नाटक करने की कोई ज़रूरत नहीं थी और रवींद्र को अपनी बाहों में भरा और मर्दाने अंदाज में उस पर चढ़ गई। अब वो मेरी तेज़ी से घबरा गया था, लेकिन मैंने इस बात की कोई परवाह नहीं की और मैंने खुद ही अपनी कमर चलाकर चुदाई की क्रिया संपन्न की और संतुष्ट हो गई।

फिर उसके बाद मैंने कई बार रवींद्र के साथ संभोग किया और जवानी का भरपूर आनंद उठाया। लेकिन 2 साल के बाद वो पढ़ने के लिए बाहर चला गया, तो में उदास रहने लगी। अब मेरे पति मेरे पास ही थे, लेकिन उनके साथ मेरा सेक्स संबंध मात्र औपचारिकता था, उनके साथ संभोग क्रिया में मुझे रत्ती भर भी मज़ा नहीं आता था। अब ऐसे ही समय गुजर रहा था, ये अभी 4 महीने पहले की बात है, मेरी बड़ी ननद ने अपने किशोर उम्र के बेटे शेखर को हमारे पास पढ़ने को भेज दिया था। अब 19 साल के शेखर को देखते ही मेरी आँखों में चमक आ गई थी और मेरे दिल में दबी प्यास फिर से जाग उठी थी। शेखर का बदन गठीला था और उसे अभी तक दाढ़ी मूँछ भी नहीं आई थी। अब में कल्पना करने लगी थी कि कब मुझे मौका मिले? और में इस लड़के को अपनी बाहों में भरकर मसल डालूं।

फिर एक दिन एकांत में मैंने शेखर को उलझाने के लिए जाल बिछा डाला, जब गर्मी का मौसम था। अब मैंने मेरी ब्रा और पेटीकोट के अलावा अपने सारे कपड़े उतार डाले और बिस्तर पर लेट गई। तभी मुझे शेखर मेरे कमरे की तरफ आता हुआ दिखा, अब उसे देखते ही मैंने अपना पेटीकोट मेरी जाँघो तक ऊपर उठा लिया और मेरी दोनों जांघे घुटनों से मोड़कर इस तरह पसार ली, जिससे की कमरे में कदम रखते ही शेखर की नज़र मेरी चूत पर पड़े। फिर मैंने अपने एक बूब्स को मेरी ब्रा से बाहर किया और उसी हालत में अपनी आँखें बंद करके लेट गई। फिर शेखर ने मुझे 2 बार आवाज़ दी मामी जी, मामी जी। लेकिन में जानबूझ कर कुछ नहीं बोली, ताकि उसे मेरी गहरी नींद का यकीन हो जाए। अब मुझे सोती देखकर शेखर का मन भटक गया था। अब एक जवान खूबसूरत औरत के खुले अंगों को देखकर कौन युवक विचलित नहीं होगा? यह सही है कि शेखर अभी जवान नहीं हुआ था, लेकिन वो बच्चा भी नहीं था।

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फिर वो धीरे से मेरे बिस्तर पर बैठ गया और मेरे खुले हुए स्तन पर अपने हाथ फैरने लगा और फिर झुककर अपने होंठ मेरे निपल पर रख दिए, तो में सिसक उठी। अब उसके नर्म होठों का स्पर्श पाकर मेरा स्तन तन गया था। फिर वो कुछ देर तक मेरे निपल को चूसने के बाद धीरे-धीरे अपने दाँतों से कुरेदने लगा। अब तो मेरे ऊपर उत्तेजना का बुखार चढ़ने लगा था। फिर काफ़ी देर तक शेखर मेरे स्तनों से ही खेलता रहा, तो मुझे बोरियत होने लगी तो मैंने नींद में ही करवट लेने का बहाना किया और इस उपक्रम में मैंने अपने पेटीकोट को पूरी तरह से अपनी कमर के ऊपर सरका दिया। अब मेरी जांघे और कूल्हें पूरी तरह से बेपर्दा हो गये थे, अब मेरी यह कोशिश सफल हो गई थी। अब शेखर मेरे कूल्हों को देखकर ललचा गया था। फिर वो मेरे पैरो के पास आकर बैठा, तो मैंने ठीक उसी समय करवट ली और सीधी लेट गई। अब मेरी मांसल गुलाबी चूत शेखर की आँखों के ठीक सामने थी।

फिर शेखर ने अपना एक हाथ मेरी एक जाँघ पर रखा और उसे सहलाते-सहलाते मेरी चूत पर आ गया। अब में उसकी नज़र बचाकर उसे निहार लेती थी और फिर दुबारा नींद का बहाना करके लेट जाती थी। फिर अचानक से शेखर उठकर खड़ा हो गया और अपनी पेंट खोलने लगा और जैसे ही उसकी पेंट नीचे सरकी, तो मैंने अपनी आधी खुली आँखों से उसे देखा। अब उसकी टागों के बीच में झूलते हुए उसके लंड को देखकर में झूम उठी थी। अब जिस शेखर को में मन ही मन बच्चा समझी थी, वो तो पूरा मर्द बन चुका था। अब उसके लंड के आस पास उगे हुए बाल इस बात की गवाही दे रहे थे कि ना केवल उस पर जवानी आ चुकी है, बल्कि वो क़िसी जवान औरत को पूरी तरह से संतुष्ट करने के काबिल भी हो चुका है। जिस तरह से भरे पूरे गोल स्तनों और कसे हुए नितम्बों वाली युवती को देखकर युवा पुरषों के लंड में कंपकपी होने लगती है, ठीक उसी तरह किसी स्वस्थ शरीर और युवा लंड वाले पुरुष के सामने आते ही युवा औरतों के स्तनों और चूत में सिहरन पैदा हो जाती है, यह कुदरत का नियम है।

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अब शेखर के मांसल लंड को देखकर मेरे स्तनों और चूत में सिहरन पैदा हो गई थी। अब मेरी इच्छा हो रही थी कि वो अपने लंड को जल्दी से मेरी चूत में प्रवेश करा दे। लेकिन उसकी इतनी हिम्मत नहीं थी, शायद वो मेरी नींद खुल जाने का ख़तरा महसूस कर रहा था इसलिए वो खूद को नंगा करने के बाद भी मुझसे लिपटने के बजाए, वो धीरे से मेरी कमर के पास बैठ गया था। फिर उसने अपना एक हाथ मेरी जांघों के बीचो बीच रख दिया, तो मैंने नींद का बहाना करते हुए अपनी दोनों जांघे पूरी तरह से फैला दी, ताकि शेखर का हाथ सीधा मेरी चूत तक पहुँच जाए। फिर शेखर ने जब मेरी जवान चूत को देखा, तो वो बेकाबू हो गया और वो धीरे-धीरे मेरी चूत को मसलने लगा और फिर अपनी एक उंगली से मेरी चूत को खोदने लगा। अब उसकी इन हरकतों से मेरी चूत पहले ही भीग चुकी थी। अब इस गीलेपन को देखकर शेखर का मन मचल गया था और फिर उसने अपनी उंगली मेरी फांकों के बीच में पूरी डाल दी। अब अपने भांजे की इन हरकतों से मुझे बहुत ही आनंद आ रहा था।

फिर उसने अपनी उंगली मेरी चूत में डालने के बाद आगे पीछे चलानी शुरू की, तो तब मेरी चूत में झनझनाहट फैल गई, लेकिन उसकी पतली 2 इंच की उंगली मेरी भूख को मिटा नहीं पा रही थी। अब में मन ही मन सोच रही थी कि काश शेखर अपनी उंगली के बजाए अपने मर्दाने अंग को मेरे गुप्ताँग में डाल दे। लेकिन शेखर था कि बस अपनी उंगली को ही सटासट चलाए जा रहा था। अब एक दो बार तो मुझे लगा कि में उसकी उंगली की हरकत से ही झड़ जाउंगी। लेकिन यह एक आधा अधूरा झड़ना होता, जो कि में नहीं चाहती थी इसलिए मैंने अपनी आँखें खोल दी और शेखर को देखने लगी। अब मेरी नींद खुलती देखकर शेखर घबरा गया और वो जल्दी से अपनी पेंट ऊपर चढ़ाकर भागने लगा। लेकिन मैंने उसे झपटकर पकड़ लिया और उसके लंड को अपनी मुट्ठी में मसलते हुए बोली कि बहुत देर से खिलवाड़ कर रहे हो, अब कहाँ जा रहे हो? तो वो सिसकते हुए बोला कि मामी जी इसे छोड़ दीजिए, दर्द हो रहा है।

फिर मैंने मुस्कुराकर कहा कि तुम इतनी देर से मेरे अंगों को मसल रहे थे, तब यह नहीं सोचा था कि मुझे भी दर्द हो रहा होगा, अब में तुझे नहीं छोडूंगी और उसके लंड की खाल को आगे पीछे करने लगी। तो शेखर बोला कि प्लीज़ मुझे जाने दीजिए, अब ऐसी ग़लती फिर नहीं होगी। तो मैंने कहा कि यह बात नहीं है मुन्ना, में चाहती हूँ कि तुम ऐसी ग़लती रोज करो, जैसे ही तुम्हारे मामा जी ऑफीस जाते है वैसे ही तुम मेरे पास आ जाया करो। फिर शेखर ने कुछ कहना चाहा, लेकिन मामी जी। तो में उसे डाटकर बोली कि क्या मामी जी, मामी जी लगा रखी है? इस वक़्त में सिर्फ़ एक औरत हूँ और तुम एक मर्द हो मेरे साथ उसी तरह पेश आओं, अब आओं और मेरे ऊपर लेट जाओं। तो शेखर संकोच भरे स्वर में बोला कि मामी जी में कुछ करना नहीं जानता हूँ, में आज से पहले क़िसी लड़की के साथ इस तरह नहीं लेटा हूँ। तो में कामुक भरे स्वर में बोली कि यह तो और भी अच्छी बात है, तुम्हारा कुँवारापन आज मेरे हाथों से टूटेगा, तुम मेरे ऊपर लेट जाओं बाकी सब में कर लूँगी।

अब मेरी बात सुनकर शेखर मेरे ऊपर उल्टा लेट गया। अब तक उसका लंड काफी मोटा और लंबा हो गया था, तो मैंने उसे सीधा अपनी चूत पर रख लिया और अपनी कमर का जोरदार प्रहार करके उसे अपनी चूत की गहराई में उतार लिया और उसके बाद में शेखर के गोरे, नर्म कूल्हों को थामकर अपनी कमर चलाने लगी। अब मेरी चूत के घर्षण से उसे भी बहुत आनंद आ रहा था, इसका प्रमाण उसकी गहरी साँसे थी, जो मेरे हर प्रहार के साथ और तेज होती जा रही थी। अब में लगातार ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगा रही थी और अब मेरी उत्तेजना चरम सीमा पर पहुँचती जा रही थी। फिर अचानक से मुझे अपनी चूत में गर्म-गर्म द्रव्य गिरता महसूस हुआ। अब में समझ गई थी कि मेरे करारे धक्को ने शेखर के लंड को लावा गिराने पर मजबूर कर दिया है, लेकिन मेरी चूत अभी भी तृप्त नहीं हो पाई थी। अब मैंने शेखर के लंड को बाहर निकालकर अपनी उँगलियों से ही मेरी चूत को नोचना शुरू कर दिया था।

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फिर शेखर बोला कि मामी जी आपका बदन कितना प्यारा है? अब शेखर मेरी चूत को प्यार भरी निगाहों से देख रहा था और बोला कि जी करता है इसे अपने होठों में दबा लूँ। तो फिर में सिसककर बोली कि वाह मुन्ना नेकी और पूछ-पूछ। फिर मैंने शेखर के बाल खींचते हुए उसका चेहरा जबरन अपनी जांघो के बीच में दबा लिया। तो शेखर कसमसा कर बोला कि मामी जी मुझे छोड़ दीजिए, मेरा दम घूट रहा है। तो मैंने उत्तेजना वश सिसकते हुए कहा कि छोड़ दूँगी राजा, पहले अपनी जीभ से मेरी सहेली को पूचकार तो दे और फिर में अपनी चूत की फांके शेखर के होंठ, गाल तथा नाक पर रगड़ने लगी। अब शेखर ने मेरी बैचेनी को भाँप लिया था और अब वो अपनी जीभ से मेरी चूत को चाटने लगा था। अब में उत्तेजना के आकाश में गोते लगाने लगी थी। तभी अचानक से शेखर ने अपने दाँत मेरी फांकों पर गढ़ा दिए, अब उसकी इस हरकत ने मेरे छक्के छुड़ा दिए थे, तो में उसी समय सिसकारी लेते हुए झड़ने लगी।

अब मेरी उत्तेजना इतनी जबरदस्त थी कि मेरा लावा बहता हुआ मेरी चूत के बाहर निकल आया था। फिर शेखर बड़े अचरज से उस पारदर्शी द्रव्य को घूरते हुए बोला कि मामी जी यह क्या है? तो में शेखर से चिपकते हुए बोली कि यह मेरा नशा है मुन्ना, जो मेरे बदन से बह निकला है, आज तो तुने अपनी मामी की सारी गर्मी झाड़ दी, तेरी कसम मज़ा आ गया। तो फिर शेखर बोला कि सच बताऊँ तो मामी जी मुझे भी मज़ा आ गया आपकी कसम। अब शेखर अपने चेहरे को मेरे स्तनों पर रगड़ने लगा था। फिर मैंने कहा कि यह मज़ा तो में तुझे रोज दे सकती हूँ मुन्ना, लेकिन तुम्हें मेरा कहना मानना होगा। तो शेखर ने कहा कि आज के बाद में वही करूँगा, जो आप कहेंगी। अब उस दिन से आज तक शेखर से मेरे संबंध बने हुए है, मैंने शेखर के कई दोस्तों से भी अपनी चूत की भूख शांत की है और अभी भी कर रही हूँ ।।

धन्यवाद …

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